जानीमानी लेखिका, इव एन्स्लेर के प्ले - दी वजैना मोनोलौग्स - के बारे में काफ़ी सुना था। आख़िर कर देखने का मौका भी मिला। महाबानो मोदी कोत्वानी और उनकी नायिकाओं द्वारा प्रस्तुत इस नाटक में चार महिलाओं ने विश्व-भर से औरतों से जुड़ी हुई भिन्न-भिन्न कहानियाँ सुनाई। उनकी प्रस्तुति में दम था... कुछ कहानियो ने मन को छूया भी... बोस्निया में औरतों का बलात्कार। ७२-वर्षीया पारसी महिला की अधूरी प्रेम गाथा। एक शादी-शुदा औरत का अपने पति के लिए अधूरा इंतज़ार। पर कहीं पर कुछ रहता था, मानो मन में एक सवाल उठ रहा था...
इन सब कहानियो के बीच, आज की औरत की कहानी कौन बताएगा?
इक्कीसवी सदी की वह औरत, जो घर से बाहर कदम रखती है, कहने को पुरूष के साथ कंधे-से-कन्धा मिला कर काम करती है, घर का बोझ और बच्चों की ज़िम्मेदारी दोनों को संभालती है, बोर्ड रूम हो या बेडरूम, दोनों में भली भाँती अपना वजूद बनाये रखती है... उस औरत की कहानी कौन सुनाएगा? क्या यह औरत -- आप और मुझ जैसी ही कोई -- क्या है उसकी पहचान? क्या वह सच में जानती है? क्या वह केवल बेटी है? बीवी? बहिन? साथी? मुम्बई की डांस बारों में नंगा नाचने वाली? दिल्ली के जी.बी रोड पर बिकने वाली? आईसीआईसीआई बैंक की सीईओ? अन्तरिक्ष में जाने वाली सुनीता विलियम?
यदि वह अपनी पहचान जानती है, तो आज की इस आधुनिक, तेज़ रफ्तार दुनिया में भी उसका वही हाल क्यों है जो शायद ३०-५० साल पहले था?
आज आप इस ब्लॉग पर आयें हैं - यह जान कर आगे पढिये, की यह ब्लॉग इसी इक्कीसवी सदी की एक औरत -- या लड़की? -- द्वारा लिखा गया है। तलाक़। अकेलापन। सन्नाटा। विश्वासघात। सब कुछ हुआ, काफ़ी कुछ हुआ। और अब वही लड़की कुछ सवाल पूछ रही है, वो जानना चाहती है... उसका वजूद क्या है? उसकी पहचान क्या है? क्या आप जानते हैं?
हर औरत के दो चेहरे होते हैं... आप कौनसा देखना चाहते हैं?
बुधवार, २० फरवरी २००८
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
1 टिप्पणियाँ:
bahauut hi acchi koshish hai Jhoomur..lagey raho !!
एक टिप्पणी भेजें