हर औरत के दो चेहरे होते हैं... आप कौनसा देखना चाहते हैं?

बुधवार, २० फरवरी २००८

शादियाँ सेक्स से नहीं बनती हैं.

“अच्छी ख़बर? अब क्या तमाशा किया है तुमने?”
“क्या? अरे रहने दो, तुम्हारे साथ ऐसी-वैसी बात कोई कहाँ कर सकता है. सुनी कब है तुमने किसी की, और अपनी माँ की तो कभी भी नहीं.”
“अच्छी ख़बर? कहीं तुम प्यार-व्यार के बारे मैं फिर तो नहीं सोचने लगी? प्लीज़ बक्श दो, ख़ुद को और हमें भी.”
“और तुम जब भी ‘अच्छी ख़बर’ सुनाती हो, मुझे तो टेंशन हो जाती है.”
“क्या-क्या तो कहती रहती हो तुम… कभी बोलती हो शादी नही करूंगी, कभी बोलती हो बच्चे नही चाहिए…”
“हाँ, हाँ, मेरे ही खयालात पुराने होंगे जो तुम्हे रोकती हूँ.”
“क्या? मैं तुम्हारी खुशी नहीं देखना चाहती? पर बेटा, तुम्हारी खुशी किस बात या किस चीज़ से मिलेगी, तुम ख़ुद जानती हो?”
“हमने भी शादी की थी और शादी निभाई भी. शादिया सेक्स से नहीं बनती हैं.”
बीच-बात मैं ही लाइन कट जाती है. शायद अच्छा ही है.
शादियाँ सेक्स से नहीं बनती हैं. पर क्या बिना सेक्स के शादियाँ टिक सकती हैं? ख़ास कर जब औरत खुश न हो और मर्द जहाँ चाहे मुंह मारता हो? अगर किसी शादी-शुदा औरत का पति उसे खुश न रखे, तो उस औरत को क्या करना चाहिए? दूसरा आदमी या ख़ुद-खुशी?

4 टिप्पणियाँ:

Dheeraj ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
Dheeraj ने कहा…

बहुत उत्तम प्रयास -- gigo

Maxine ने कहा…

Kya kya likha hei aapne kuch pata naheee....phir bhi acha laga.
aap ki kaan ke neeche ek nanni si mwah :D

Vibhash Prakash Awasthi ने कहा…

lag raha hai manohar kahaniyan, grihshobha ya grihlaxmi ka koi lekh padh rahe hon....