हर औरत के दो चेहरे होते हैं... आप कौनसा देखना चाहते हैं?

गुरुवार, २१ फरवरी २००८

प्यार, परिवार और परमात्मा का रूप…बच्चे?

उस दिन दीवाली थी और हर ओर अलग-अलग किस्म की लाइटें टिमटिमा रही थी. दीये तो आज कल आउट-ऑफ़-फैशन हो रहे है: भला बार-बार घी डाल कर, रुई लंबा कर कौन नाईट-ड्यूटी करेगा? मोमबत्ती भी कुछ देर जल कर बुझ जाती है. पिछले दस सालो में, दीवाली का भी मानो तकनिकी ट्रांसिशन हुआ है: “फेरी लाइट" बोलते हैं, बिजली से चलने वाली छोटी-छोटी, कई रंगों मैं आने वाली इन बल्बों को। खैर…त्यौहार कुछ अजीब से सवाल उठाते हैं मेरे मन मैं. बाहर होली के रंग बिखर रहे होते हैं और मेरे मन का रंग कुछ और होता है. बाहर दीवाली की लाइटें चमक रही होती हैं और मन में कुछ अँधेरा सा हो रहा होता है. शायद इस बेरंगी और अन्धेरेपन का कारण है कि कोई भी त्यौहार, प्लान के अनुसार कभी नहीं जाता और किसी-न-किसी वजह से, त्योहारों पर मैं अकेली होती हूँ. या फिर जिनके साथ होना चाहती हूँ, वह नहीं होते।


पर फिर सोचती हूँ, अकेले त्योहारों मैं अकेली घुटते रहने से किसका फायदा होगा? कुछ बदलता थोड़े ही है। फिर सोचती हूँ कि यदि जो-सोचा-सो-हुआ होता तो शायद इस पोस्ट को लिखने का टाइम भी नहीं मिलता. सो ठीक है, कभी कुछ मिलता है, कभी कुछ: अभी साथी नहीं है, तो अपने लिए, लिखने के लिए बहुत समय है। कभी सोचा है आपने : हम सब, आप, मैं, मेरे पड़ोस में मिश्राजी, हम सब दोस्त क्यों खोजते हैं? क्या केवल समय बिताने के लिए? टाइम पास? या फिर कोई एक्सक्लूसिव इंसान, उस समय को बिताने के लिए, जो केवल हमारा हो? मेरी सहेली कहती है कि उसने अपने अकेलेपन का इलाज या समाधान ढूँढ लिया है: वह एक शिशु गोद लेगी। शिशु. बच्चा. अब बताये ज़रा, ख़ुद बोरे हो रहे हो तो बच्चा गोद ले और उसे बोरे करें??? कोई गुडिया थोड़े ही है, कि खेलने का मूड हो तो अलमारी से निकाल ली, कुछ देर खेल लिए और रोने लगे तो सेल निकाल कर बंद कर दी. वैसे अगर बच्चे सेल के साथ आते तो क्या बात थी.


अकेलेपन इसलिए महसूस होता है क्योंकि हम किसी से बात करना चाहते हैं, जो सोचते है-समझते हैं उसे शेयर करना चाहते हैं, मिलना चाहते हैं, सेक्स भी चाहते है. तो इन सब मैं बच्चा बीच मैं कहाँ से आया? और अगर अकेलेपन का इलाजad टाइम पास है तो कुत्ता पाल लो भाई। इन्ही सब बातों से जूझ रही थी बरामदे पर जब मिश्राजी दिख पड़े. आप पूछेंगे, अब बेवकूफ कौन है? कहने को तो मेरे पड़ोसी है, पर नाक में दम का दर्जा उनपर ज्यादा भाता है. कभी मेरी टंकी से पानी चुराते हैं, कभी मेरे गेट के सामने गाड़ी पार्क कर देते हैं, मेरे कुत्ते भोंके तो सबसे ज्यादा परेशानी मिश्राजी को ही होती है, शायद सेंसिटिव कान हैं उनके. खैर…

जब मिश्राजी दिख ही गए थे तो झट से मैंने पूछ लिया की मिश्राजी अकेलेपन और बोरियत से जूझने के लिए बच्चों का आईडिया कैसा है? कुछ देर तो मुझे सकपकाकर देखते रहे ऐसे मानो दुनिया की सबसे बड़ी बेवकूफ सामने खड़ी हो, फिर सिर खुजाते हुए बोले -- अरे मैडम, अकेलेपन और टाइम पास के बारे में रिटायर होने के बाद सोचूंगा अभी बच्चों का मतलब है खर्चा और मेरे पास मीडिया के लिए फिजूल टाइम नहीं है।" और बस नाक चढा कर अपने घर के भीतर घुस गए। पर ना चाहते हुए भी जवाब दे गए थे -- जब बच्चे छोटे होते है, तो खर्चा कराते हैं और जब बड़े हो जाते हैं तो छोड़ कर चले जातें हैं। और रह जाते हैं हम टाइम पास करने के लिए। अंग्रेज़ी में इसे 'बैक टू स्कवैर वन' बोलते हैं। २८ पर भी वही, ५६ पर भी वही।